मंगलवार, 15 नवंबर 2011

घोर अपमान

पारद पादुका पूजन के लिए एक श्लोक है- गृह स्याद् यस्य पूजायां गुरू पारद-पादुका, देवा अपिच तद्भाग्यं धन्यं धन्य तरं विदु. इस सिध्दान्त को अपना आधार बिंदु बना कर चलने वाले ही अपने भक्तों से अपने चरण पर रूपये न्यौछावर करने वालों के सामने उन रूपयों का अपमान करें, तो आप इसे क्या कहेंगे? छ्त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में श्रीमाली परिवार के नन्द किशोर श्रीमाली ने 8 नवम्बर से 10 नवम्बर तक धर्म चेतना रथ यात्रा के साथ पूर्णोत्सव, ध्यान, साधनाएं, दीक्षाएं, प्रवचन, पूजन का कार्यक्रम आयोजित कराया. इस तीन दिन के कार्यक्रम में वे रायपुर के स्टार होटल सेलिब्रेशन में रूके. इय दौरान उनके भक्तों की भीड़ लगी रही. उनसे प्रत्यक्ष मिलने की भी होड़ लगी रही. इन्हीं भक्तों ने गुरू के चरणों में न केवल अपने शीष नवाये वरण आरती की थाली में चढ़ावा चढ़ाने या कहें मंदिर में भगवान के चरणों में रूपये चढ़ाने की परम्परा का निर्वाह करते हुए नन्द किशोर श्रीमाली के चरणों में रूपये अपनी श्रध्दानुसार रखे, तब इन नन्द किशोर श्रीमाली ने जो किया वह मेरे गले नहीं उतर रही है. उन्होंने अपने पैरों के नीचे इन रूपयों को दबा कर रख लिया. क्या ऐसा धन लक्ष्मी के साथ हिन्दु परिवार कर सकता है? हमारी भारतीय संस्कृकि के अनुसार जब परिवार में एक बच्चा शिक्षा ग्रहण करने की उम्र में आता है, तो उसका तिलक लगा कर एवं पुस्तक, कलम की पूजा की जाती है. ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि वह ज्ञानी बने और उस प्राप्त ज्ञान से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषक करने के काबिल बने. हम गलती से भी किसी कापी, पुस्तक या पेपर को ही पैर से छू लेते हैं तो उस गलती के लिए क्षमा मांगते हैं. यह हमारी संस्कृति की देन है. ऐसा संस्कार हमें मिला हो और जो स्वयं को ज्ञानी बता कर कोई व्यक्ति आपकी आखों के सामने ऐसा कर रहा हो तो क्या आप उन सज्जन के समक्ष नतमस्तक होंगे? क्या आपको ग्लानी नहीं होगी कि ये कैसा धर्म के नाम पर पाखंड कर रहा है? क्योंकि श्रीमाली परिवार श्री निखिलेश्वरानंदजी के नाम पर विगत दो से तीन पीढ़ी से, जिसमें नारायण दत्त श्रीमाली, कैलाश चन्द्र श्रीमाली, अरविंद श्रीमाली और नंद किशोर श्रीमाली शामिल हैं, अपनी पत्रिका के साथ कुण्डली जागरण दीक्षा, तंत्र-मंत्र कवच, समय दीक्षा, ज्ञाल दीक्षा, जीवन मार्ग दीक्षा, शांभवी दीक्षा, विद्या दीक्षा, शिष्या दीक्षा, धन्वंतरि दीक्षा, सहित दुर्लभ साधनाए- पुष्पदेहा अप्सरा साधना, सवत्रजन वशीकरण प्रयोग, कामदेव रति साधना, गृहस्थ जीवन की आवश्यकता साधना, गृह निवारण प्रयोग, स्वयंवर अप्सरा साधना, विश्व की अप्रतिम साधना-दूर श्रवण साधना, मनोवांछित पदार्थ पाईये- शून्य साधना से, संतान प्राप्ति का अनुभूत प्रयोग-पष्ठी देवी साधना और अद्श्य होने का गोपनीय प्रयोग-पारद गुटिका द्वारा के अलावा 24 प्रकार की सिध्दि और साधना की पुस्तकें बेचने का कार्य में लगी हुई है. क्या ऐसे कार्य में लगे व्यक्ति विशेष के प्रति आपकी श्रध्दा बनी रह सकती है?

बच्चे मन के सच्चे

बाल दिवस के दिन ही क्यों हमें बच्चों का ध्यान आ जाता है. साल भर हमारी इन बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं होता और जब हम जागते हैं, तो ख्याल आता है कि बच्चों के यह खेलने-कूदने के दिन हैं. वे जितना खेल में ध्यान देंगे उनमें उतनी ही स्फूर्ति और ताकत बनी रहेगी. शिक्षा विभाग ने भी एक कानून बना रखा है कि जहां भी स्कूल हों वहां खेल के मैदान अवश्य हों. ठीक ऐसे ही यदि कोई कालोनी डेव्लप कर रहा हो, तो उन्हें भी हर प्लान के साथ गार्डन के लिए जगह छोड़ कर रखना होगा और उसे बच्चों के लिए विशेष तौर पर तैयार करना होगा, लेकिन स्कूलों में इन खेल मैदानों की क्या स्थिति है, यह हम सभी जानते हैं. मैदान के नाम पर जो जमीन है वह ना तो समतल है ना ही स्कूलों में खेल सामग्री या खेल शिक्षक हैं. यह जरूर देखा गया है कि जैसे ही बरसात होती है इस उबड़-खाबड़ खेल मैदान में तालाब बन जाता है और वहां बच्चे शिक्षक की अनुपस्थिति में छप-छप खेल कर घर लौट आते हैं. वैसा ही हाल कालोनियों का है. उनके द्वारा बनाए गये नक्शे में जरूर गार्डन के लिए जगह छोड़ी जाती है और जब कालोनी डेव्लप हो जाती है तब लोगों की उस कालोनी में स्थान की मांग बढ़ती है, तो गार्डन की जमीन को बेच कर कालोनाईजर अपनी जेब गरम कर लेता है. ऐसे में ये नन्हे बच्चे या तो अपने घरों की छत में खेलने मजबूर होते हैं या फिर सड़कों को घेर कर कुछ समय के लिए क्रिकेट खेल कर अपना मन बहला लेते हैं. इनके खेलने पर मां-बाप की भी पाबंदी रहती है कि इस बच्चे के साथ ही खेलें या इसके साथ नहीं खेलें, तब बच्चा या तो टी.वी. से जा चिपकता या फिर कम्प्यूटर में गेम खेल टाइम पास करता है. क्या 14 नवम्बर के दिन जिसे हम बाल दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाते हैं उसी दिन हमारे नेताओं की चेतना जागृत होगी? वे क्या हर साल इन बच्चों को सिर्फ कापी-पेन, फल या स्कूलों में विभिन्न स्पर्धा आयोजित करा इन्हें पुरस्कृत कर अपनी जिम्मेदारी से फारिग हो जाऐंगे? दूसरे दिन इन मासूम बच्चों के साथ फोटो सहित अखबारों में छप कर खुश होंगे कि हमने बच्चों के लिए ये किया वो किया. क्या हमारी नैतिक जिम्मेदारी इस एक दिवसीय कार्यक्रम के आयोजन के साथ समाप्त हो जाती है?

आर्टिलरी गन

लगातार बढ़ रही जनसंख्या और वाहनों की कतारों को देखते हुए सड़के कम पड़ रही है. भीड़ इतनी हो गई है कि सड़कें सकरी गलियों का अहसास कराने लगी है. ऐसे में सड़क चौड़ीकरण करना जरूरी हो रहा है. अभी कल ही छत्तीसगढ़ के अनुपम गार्डन के पास लगे बरसों पुराने इमली के पेड़ को सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काट दिया गया ताकि लोगों के चलने के लिए तीन से चार फीट जमीन और मिल जाए. इसी सड़क में अभी कुछ दिनों पहले भी दो पेड़ों को काट कर अलग किया गया है जिसके निशान अभी भी देखे जा सकते हैं क्योंकि जिस चौड़ीकरण के नाम पर इन दो पेड़ों को काटा गया उस स्थल में सिर्फ बजरी गिट्टी डाल कर छोड़ दिया गया है और लोगों को अब वहां से सावधानी के साथ अपने वाहन चलाने पड़ रहे हैं. इसी अनुपम गार्डन के पास नगरनिगम द्वारा एक एतिहासिक तोप को रखा गया है, परंतु निगम की लापरवाही ही कहे कि अब तक उसका उदधाटन नहीं कराये जाने के कारण यह क्या है किस सन् का है? किसी के समझ में नहीं आ रहा है. स्थिति यह है कि धुल, गर्मी, बरसात में खुले आकाश के नीचे होने के कारण जंग लग कर सड़ रहा है. अब पता चला है कि जबलपुर सैनिक हेडक्वार्टर से दो आर्टिलरी गन को मंगाया गया था, जो निगम मुख्यालय भवन में पहुंच गया है. मालूम हुआ है कि इसे निगम मुख्यालय भवन में रखा जाएगा. मुझे पता है ऐतिहासिक चीजों का संकलन करने का हमें शौक तो है, पर उसकी उचित देखभाल करने की जिम्मेदारी निभाने की हममे क्षमता नहीं है. आज जरूर यह हमारे कौतुहल को बढ़ाने और उसे जानने की जिज्ञासा को शांत करेगा पर इसका भविष्य में क्या होगा कहा नहीं जा सकता. हमने ऐसे ही अनेक महापुरूषों के आदमकद मूर्तियां बनवायी और उसे विभिन्न चौक-चौराहों में लगाया, पर जब यातायात का दबाव बढ़ा तो इन महापुरूषों को सड़क के किनारे ऐसी जगह में पुन:स्थापित कर दिया, जहां किसी की नजर भी नहीं जाती और नजर पड़ भी गई तो आप शर्म से अपनी आँखे झुका लेंगे क्योंकि वहां पर पुरूषों ने मुत्रालय का काम लेना शुरू कर दिया है. क्या इन आर्टिलरी गनों की हमें आवश्यकता है? क्या इसकी समस्त देखरेख-रखरखाव,उचित जानकारी देने तख्ती लगायी जाएगी? क्या कुछ वर्षों बाद ये हमें किसी कबाड़ में देखने को मिलेंगे? क्या इन गनों को सैनिक मुख्यालय में नहीं रखा जा सकता? या जहां इसकी उपयोगिता है वहां इसे रखे जाने की ओर हमारा दायित्व नहीं बनता?

हो रहा भारत निर्माण

कुछ सरकारी विज्ञापन मन को नई ऊर्जा देने में कामयाब होते हैं. इन विज्ञापनों को इस तरह से गीतों में पिरो कर पेश किया जाता है कि वह हमारी जुबान पर बस जाता है. कुछ ऐसा ही हो रहा भारत निर्माण में उपयोग किये गये गीत के साथ. चाहे आप इसे अपने टीवी पर देखें या रेडियो सुनने के दौरान इस विज्ञापन को सुन लें, पर जब सबसे पहली बार जब मैंने इस विज्ञापन को रेडियों में सुना तो अचानक चौंक गई. अरे यह क्या? इसमें एक लाइन है- सड़क बनी कच्चा रस्ता.. इसे सुन कोई भी भारतीय एक बार ठिठकेगा जरूर कि यह क्या कहा जा रहा है. हालाकि वहां कहने का आशय यह है कि जो कच्चे राह थे अब वहां पक्की सड़कें बन गयी है, पर जब इसे आप ध्यान से नहीं सुनेंगे तो आपको लगेगा कि जो सड़कें बनी है वह कच्चा रास्ता बन गया है. दरअसल समाचार बनाने (प्रिंट मीडिया) समाचार दिखाने (इलेक्टॉनिक मीडिया) और विज्ञापन के लिए जिंगल बनाने का एक अलग ही तरीका होता है यदि आप इसमें आप जरा सा भी चुक करते हैं तो वह अपना असर समाप्त तो करता ही है उसके अनेक अर्थ भी निकाले जाते हैं.
करे कोई भरे कोई 8 नवम्बर 2011 का दिन एतिहासिक होते जा रहा है और हो भी क्यों नहीं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का जन्मदिन जो था, पर इसके पीछे जो राजनीति हुई वह इतनी सुर्खियां बटोर रही है कि मामला कोर्ट में जा पहुंचा है. 9 नवम्बर को मैंने दो ऐसे कवियों का जिक्र करते हुए एक प्रश्न अपने साथियों के साथ शेयर किया था कि जन्मदिन नहीं मनाने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने 17 लाख से अधिक की राशि इसके कारण बताने कविता के रूप में विज्ञापन छपा कर खर्च कर दिए तो इसके जवाब में एक कविता हमें दूसरी पार्टी के तरफ से पढ़ने को मिल गया. अब अगली लड़ाई इस बात को लेकर है कि दूसरी पार्टी ने क्यों इस कवितानुमा गीत को प्रकाशित करने के लिए सरकारी विज्ञापन एजेंसी के तहत इसे छपाया. दरअसल सरकारी खजाने को इस तरह से वार करने के नाम पर खर्च नहीं किया जा सकता. इस पर संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन होता है. सचमुच यहां गलती हुई है. क्या इस विज्ञापन को प्रकाशित कराने किसी मंत्री से सलाह नहीं ली गयीहोगी? क्या इसके पीछे किसी मंत्री या नेता का हाथ नहीं होगा? क्या इसके लिए वे अधिकारी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने ये विज्ञापन रिलीज करने सरकारी विज्ञापन एजेंसी का इस्तेमाल किया? यदि ऐसा किसी अधिकारी ने किया तो विज्ञापन रिलीज होने से पहले उस नेता या मंत्री ने उस पर अपने हस्ताक्षर तो किये ही होंगे? जो भी हो मंत्री या नेता का नाम आये बगैर इन अधिकारियों पर गाज गिरने वाली है, जिन्हें इस तरह की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है.

सोमवार, 16 अगस्त 2010

shashi

·स·
मनुष्य ·े जीवन में अने· उतार-चढ़ाव आते हैं और इ हीं सब
·े बीच वह सुख-दुख ·ो साथ-साथ जीते हुए इस संसार से
विदा ले लेता है. हर इंसान ·े पास इ हें जो उसने भोगा है, ·ो
बताने ·े लिए ल बी ·हानी होती है, जिसमें से वह ·ुछ सुख
·े पलों ·ो याद रखता है और अनगिनत दुखद क्ष ाों ·ो जो
संभवत; उस·े जीवन जीने ·ी शैली ·ो बदल देता है, हमेशा
याद रखता है. ऐसे ही ए· स्·ूली छा ाा जो अपने ·ैरियर ·ो
ले·र सपने संजो ·र ·ॉलेज ·ी सीढिय़ॉं चढऩे जा रही है, से
मेरी ·ाउ सलिंग ·े दौरान मुला·ात हो गई.
वह ·ाउ सलिंग ·े समय बहुत चह· रही थी. उसने अच्छे रैं·
प्राप्त ·िये थे. शास·ीय ·ॉलेज ·ी सीटें भर गयी थी, पर जिस
·ॉलेज में पढऩे ·ा रोमांच उसे था, उसी ·ॉलेज में उसे प्रवेश ·े
लिए सहमति मिल गयी. मेरी भतीजी ·ो भी ·ुछ ऐसा ही
रोमांच था, उसे भी उसी ·ॉलेज में दाखिले ·ी अनुमति मिल
गयी. मैं भी खुश थी ·ि ·ॉलेज में दोनों ·ा साथ रहेगा. ए·
दूसरे ·ा मोबाइल न बर लेने-देने ·े बाद ·ॉलेज में मिलने ·ा
वादा ·र दोनों अभी-अभी बनी सहेलियॉं विदा हो गई.
एडमिशन से पूर्व निर्धारित तिथि त· ·ॉलेज ·ी फीस जमा ·र
देनी थी. चूं·ि मैं नौ·रीपेशा हूं इसलिए ·ॉलेज ·ी फीस ·े
विषय में जान·ारी लेने में मुझे असुविधा हो रही थी. दरअसल
·ॉलेज शहर से 20-22 ·िलोमीटर ·ी दूरी पर स्थित है और
उस ·ॉलेज ·ा सिटी ऑफिस बंद मिल रहा था. वहां ·े फोन
·ो इसलिए ·ोई अटे ड नहीं ·र रहा था. उस लड़·ी ·ो ऐसे
में विस्तृत जान·ारी लेने ·े लिए मैंने मोबाइल ·िया.
- हलो - प्रतिमा
- हॉ.. बोल रही हूं.
- मैं.. पहचानी ऊॅं.. एश्वर्या ·ी बुआ बोल रही हूं.
- हॉ ऑटी पहचान गई.
- या हुआ रे- तूने फीस जमा ·र दी या?
- नहीं ऑटी और वह खामोश हो गई.
- हलो..हलो..
- ऑटी मेरे भाई से बात ·र लें.
- या हुआ मनोज, प्रतिमा अचान· खामोश यों हो गई, ·ोई
खास बात..
- हॉ ऑटी लगता है, वो उस ·ॉलेज में नहीं पढ़ पायेगी.
- ऐसा यों?
- इस साल से उस ·ॉलेज ·ी फीस बढ़ गयी है औेर ए· साथ
इतने रुपये देने से चाचाची मना ·र रहे हैं.
- तुम ·ॉलेज जा·र वहां बात ·र लो और दो ·िस्तों में फीस
जमा ·र दो, ·ोई परेशानी नहीं है.
- वो बात नहीं है ऑटी चार साल त· आखिर ऐसे ही इतने और
यदि फिर फीस ·ी र·म बढ़ गई, तो उससे यादा रुपये देने
होंगे.
यह बात सुन ·र मैं खामोश हो गई. मेरे दिमाग में भी उथल-
पुथल मचने लगा. ये छोटे-छोटे ब"ो ·ितनी दूर ·ी बात सोचने
लगे हैं, पर उन·ा ·ैरियर? उन·ी बातों से जाहिर हुआ ·ि वे
अपने चाचा पर निर्भर हैं यदि उ होंने हामी भरी तो ठी· नहीं तो
बीएससी ·े लिए सर·ारी ·ॉलेज में एडमिशन मिल ही जायेगा,
ले·िन या यह उस छोटी सी ब"ाी ·े साथ अ याय नहीं होगा?
मुझे अपनी भतीजी ·ो पढ़ाना ही है. मैंने रुपयों ·ा इंतजाम ·ैसे
·िया, यह अपनी भतीजी पर जाहिर नहीं होने दिया. बस यही
·हा- अच्छे से पढऩा बेटा ये रुपये यूं ही बर्बाद न हो.
ए· रात प्रतिमा ने मेरी भतीजी से लगभग रोते हुए फोन में ·हा-
मैं अब पढ़ नहीं पाऊंगी लगता है. और उसने अपनी बड़ी बहन
·ो फोन थमा दिया. वह भी यादा ·ुछ बोल नहीं पायी.
अपने आसपास प्रतिभावान ब"ाों ·ो इस तरह से आर्थि· तंगी
·े चलते पिछड़ते देखना अंदर त· उद्देलित ·र देता है और यह
भी सोचने बा य ·रता है यदि प्रतिभा ·ी जगह उस·ा भाई
होता, तो या उस·े चाचा ·ा र्नि ाय बदल नहीं गया होता? मुझे
पक्का य·ीन है प्रतिभा ·े चाचा ने अपनी आर्थि· स्थिति ·ा
खुलासा ·रने ·े साथ ये श द भी ·हे होंगे- हमारी स्थिति जैसी
है वैसा ही पढ़ायेंगे. शादी ·े बाद अपने सारे शौ·, इच्छाएं पूरी
·र लेना, पर या पढऩे ·ी वह उम्र और बिता हुआ समय
प्रतिभा ·ो मनचाहा ·ैरियर बनाने देगा? यह तो ए· उदाहर ा
है. न जाने और ·ितने ब"ो इस तरह से चाह ·र भी होशियार
होने ·े बावजूद अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं.
0 शशि परगनिहा

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

shashi

है ना बोलो-बोलो या दिल-विल प्यार-व्यार
प्रेम में आ·ंठ डूबे प्रेमी-प्रेमि·ा अपने ही संसार में विचरण ·रने लगते हैं. सदैव अपने प्रेमी-प्रेमि·ा ·े ख्यालों में खोये रहते हैं और लगभग अन्य लोगों, जिन·े साथ उन·ा उठना-बैठना होता था, उन्हें प्र·ृति, और सौंदर्य ·े अलावा ·ुछ भी नहीं दिखता .
प्यार ·रने ·े लिये दिमाग ·ी जरूरत नहीं पड़ती. वो देखो प्यार में पागल व्यक्ति जो हर वक्त अपनी प्रेमि·ा ·ी यादों में खोया रहता है. प्यार ·ी ऐसी दीवानगी हमने तो देखी नहीं, अब तो ये हमारे साथ उठता-बैठता भी नहीं. जब देखो तब अपनी प्रेमि·ा से मिलने, उसे गिफ्ट देने, डेटिंग ·रने में लगा रहता है. ·ुछ ऐसी ही बातें दोस्तों ·े बीच अक्सर सुनने ·ो मिलती है जब उन·े ग्रुप ·े ·िसी ए· ·ो प्यार ·ा बुखार चढ़ जाता है. प्यार में खोये-खोये से रहने वालों ·ो अर्थात इश्· ·ो ·ेमि·ल अट्रैक्शन ·हा जाने लगा है.
प्रेम ·िया नहीं जाता हो जाता है. प्रेम ·रना ·िसी ·ो सीखना नहीं पड़ता, यह संयोग से हो जाता है. प्रेम में आ·ंठ डूबे प्रेमी-प्रेमि·ा अपने ही संसार में विचरण ·रने लगते हैं. सदैव अपने प्रेमी-प्रेमि·ा ·े ख्यालों में खोये रहते हैं और लगभग अन्य लोगों, जिन·े साथ उन·ा उठना-बैठना होता था, उन्हें प्र·ृति, और सौंदर्य ·े अलावा ·ुछ भी नहीं दिखता और ऐसे प्रेमी युगल ·ो आप छेड़ दें तो वे जालीम जमाना प्यार ·ा दुश्मन जैसे तोहमत लगा·र अ·ेले में रोते बिलखते भी देखे गये हैं, क्यों·ि प्रिय ·े सामीप्य ·ी चाह प्रेम ·ी आखरी मंजिल है.
प्रेम आखिर है क्या? ए· वैज्ञानि· ·ी नजर में प्रेम ·े तीन स्तर होते हैं. और प्रत्ये· स्तर पर हार्मोन ·ी भूमि·ा मुख्य होती है क्यों·ि सैक्स हार्मोन टेस्टोस्टेशेन और आस्ट्रोजन ·े स·्रिय होने पर विपरीत सेक्स ·े प्रति आ·र्षण पैदा होता है, जो ·िशोरावस्था से स·्रिय होने लगते हैं. प्रेम ·े दूसरे स्टेज में तीन तरह ·े रसायन (न्यूरोट्रांसमीटर) एट्रेनालीन, डोपामाइन तथा सेरेटोनिन ·ी स·्रियता ·े प्रभाव में आ·र विपरीत सेक्स ·ी ओर झु·ाव होता है. ऐसी अवस्था में तन और मन दोनों में मीठी तरेंगे उठने लगती है. रक्त ·ा प्रसार अचान· बढ़ जाता है जिससे चेहरे में लालिमा छा जाती है. डोपामाइन ·ा प्रभाव ·िसी नशे से ·म नहीं होता. उस पर सेरेटोनिन प्रेम में और भी आगे बढ़ते हुए अच्छे बुरे ·ा विवे· ही समाप्त ·र देता है. इसी स्टेज में पहुंचे प्रेमी युगल ·ो यदि मिलने न दिया जाये, उन पर पहरे लगा दिये जायें, तो वह विद्रोह ·र देता है और ·भी-·भी वे मौत ·ो गले लगाने से भी नहीं हिच·ते.
प्यार ·ी गहराई ·ो ·ैसे मापा जाये इस·े लिये भी शोध ·िया जा चु·ा है. ए· शोध ·े अनुसार (ऑब्सेसिव ·ंपलसिव डिसऑर्डर) ओसीडी नाम· मानसि· रोग से ग्रस्त मरीजों और प्रेमियों ·ी ए· जैसी मानसि· स्थिति होती है. जांच में यह पाया गया ·ि प्रेमियों और ओसीडी ग्रस्त रोगियों में सेरेटोनिन ·ी मात्रा त·रीबन बराबर थी. इसीलिये ·हा जाता है ·ि प्रेम पीपल ·े बीज ·ी तरह होता है. यह ए· बार जड़ प·ड़ ले तो सूखता नहीं है. जीवन ·े आपाधापी में ·ट छंट जाता है, पर निर्मूल नहीं होता.
शोध ·ा निष्·र्ष ·हता है ·ि प्रेम ए·ाग्रता बढ़ाता है. प्रेमियों ·े जीवन शैली में सुधार ला·र उसे नियमित ·रता है. प्रियवर ·ो रिझाने ·े लिये नित-नये प्रयोग ·रने ·ो प्रेरित लगता है. इसलिये वह अपने आप पर ज्यादा ध्यान देने लगता है. हर वक्त अपने ·ो फिट रखने ·े लिये जतन ·रता है. वैसे ·हा जाता है ·ि प्रेम शाश्वत है यह ·ाल और सीमा से परे है.
इन सब·े बावजूद प्रेम आज देह त· सीमित हो जाने ·े ·ारण इस·ा बिगड़ा स्वरूप देखने ·ो मिल रहा है. प्रेम में उग्रता आने लगी है. फिल्मों में दिखाये दृश्यों ·ो प्रेमी स्वयं पर प्रयोग ·र डराने- धम·ाने और उसे अपने पक्ष में ·रने दबाव बनाने लगे हैं. क्या ऐसे प्रेम जिसमें डर और दबाव बना हुआ है, वह ता-उम्र बना रहेगा, ·दापि नहीं, ऐसे प्रेमी वक्त ·ाटने प्रेम ·ा सतही जाल बिछा·र ·िसी ·ी भावनाओं से खेलने से भी नहीं चू·ते. प्रेम खूबसूरत अहसास है जिस·े साथ खिलवाड़ नहीं ·िया जाये तो अच्छा है. वरना उम्र भर पछतावे ·े अलावा ·ुछ भी हासिल नहीं होगा.
- शशि परगनिहा (रायपुर)
..............................................